मंगलवार 26 मई 2026 - 16:08
ग़दीर सभी मुसलमानों की पहचान और शियों की विशेष पहचान है: हुज्जतुल-इस्लाम शाहरुख़ी

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने कहा है कि ग़दीर केवल शियों की ही नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों की धार्मिक और आस्थागत पहचान है, जबकि शिया मकतब (विचारधारा) की प्रमुख पहचान भी ग़दीर ही है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने कहा कि ग़दीर केवल शियों की ही नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों की धार्मिक और आस्थागत पहचान है, जबकि शिया मकतब की प्रमुख पहचान भी ग़दीर ही है।

ख़ुर्रमाबाद में ईद-ए-क़ुर्बान और दस दिवसीय इमामत व विलायत के अवसर पर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए लोरिस्तान प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि इमाम जुमा ने कहा कि ग़दीर की महानता इतनी ऊँची है कि अहले-बैत (अ) की रिवायतों में इस पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने इमाम सादिक़ (अ) का कथन उद्धृत करते हुए कहा कि जो व्यक्ति ग़दीर की महानता को मानता है और उसका सम्मान करता है, फ़रिश्ते दिन में कई बार उससे मुसाफ़ा करते हैं और उसके लिए रहमत की दुआ करते हैं।

उन्होंने कहा कि सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों ने ग़दीर के स्थान और प्रतिष्ठा को महत्व दिया है, और इतिहास में बहुत कम ऐसे विषय मिलते हैं जिन पर पैग़म्बरों ने इतना ध्यान दिया हो। यह ग़दीर की महानता और इस्लामी संस्कृति में इसके उच्च स्थान का स्पष्ट प्रमाण है।

सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने हज़रत अमीरुल-मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) की प्रशंसा में कहा कि वह ज्ञान, जिहाद (संघर्ष) और परहेज़गारी (तक़्वा) हर क्षेत्र में सबसे श्रेष्ठ थे। रसूल-ए-अकरम (स.अ.व.) का प्रसिद्ध कथन "मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली इसका द्वार है" इसी सत्य को व्यक्त करता है कि अली इब्न अबी तालिब (अ.स.) पैग़म्बरी ज्ञान के द्वार हैं। उन्होंने कहा कि अपने समय के ख़लीफ़ा भी वैज्ञानिक और न्यायिक मामलों में हज़रत अली (अ.स.) की ओर रुजू करते थे।

उन्होंने आगे कहा कि जिहाद के मैदान में भी अमीरुल-मोमिनीन (अ.स.) की बहादुरी अद्वितीय थी और बद्र, उहुद, अहज़ाब और ख़ैबर जैसे युद्धों में उनकी कुर्बानियाँ इस्लाम के इतिहास का एक उज्ज्वल अध्याय हैं। इसी प्रकार तक़्वा और न्याय के क्षेत्र में भी वह पूर्ण उदाहरण थे।

ख़ुर्रमाबाद के इमाम जुमा ने हज़रत अली (अ.स.) के इस कथन की ओर इशारा किया कि यदि उन्हें काँटों पर घसीटा जाए, तब भी वह किसी चींटी के मुँह से अन्यायपूर्वक जौ का छिलका लेना पसंद नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि यह न्याय और तक़्वा की परम ऊँचाई है और इस्लामी व्यवस्था के सभी ज़िम्मेदारों के लिए एक बड़ा सबक है कि वे जनता के अधिकारों की रक्षा करें।

उन्होंने कहा कि गैर-मुस्लिम विद्वान भी इमाम अली (अ.स.) के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। ईसाई विचारक जैसे जुर्ज जुर्दाक़ और शिबली शुमैल ने अमीरुल-मोमिनीन (अ.स.) को सभी मानवीय गुणों का समूह बताया है।

अपने भाषण के दौरान उन्होंने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुश्मन की चालों और छल के मुकाबले में ईरानी राष्ट्र को सचेत रहना होगा। उन्होंने कहा कि हर युद्ध बातचीत पर समाप्त हो सकता है, लेकिन मूल मुद्दा राष्ट्रीय सम्मान, जागरूकता और हितों की रक्षा है। जनता की अपेक्षा है कि वार्ता करने वाले, राष्ट्र और सशस्त्र बलों की प्रतिरोधी भावना के अनुसार कदम उठाएँ और राष्ट्र के अधिकारों पर कोई समझौता न करें।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईरानी जनता, विशेषकर युवा, जनजातियाँ और लोरिस्तान के क़बीले, हमेशा इस्लामी क्रांति और देश की रक्षा के लिए तैयार रहे हैं। अंत में उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सद्भाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि दुश्मन मतभेद पैदा करके देश को नुकसान पहुँचाना चाहता है, इसलिए सभी को सतर्क रहना होगा।

ग़दीर सभी मुसलमानों की पहचान और शियों की विशेष पहचान है: हुज्जतुल-इस्लाम शाहरुख़ी

हौज़ा / हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने कहा है कि ग़दीर केवल शियों की ही नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों की धार्मिक और आस्थागत पहचान है, जबकि शिया मकतब (विचारधारा) की प्रमुख पहचान भी ग़दीर ही है।

हौज़ा समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने कहा कि ग़दीर केवल शियों की ही नहीं, बल्कि सभी मुसलमानों की धार्मिक और आस्थागत पहचान है, जबकि शिया मकतब की प्रमुख पहचान भी ग़दीर ही है।

ख़ुर्रमाबाद में ईद-ए-क़ुर्बान और दस दिवसीय इमामत व विलायत के अवसर पर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए लोरिस्तान प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि (इमाम जुमा) ने कहा कि ग़दीर की महानता इतनी ऊँची है कि अहले-बैत (अ.स.) की परंपराओं (रिवायतों) में इस पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने इमाम सादिक़ (अ.स.) का कथन उद्धृत करते हुए कहा कि जो व्यक्ति ग़दीर की महानता को मानता है और उसका सम्मान करता है, फ़रिश्ते दिन में कई बार उससे मुसाफ़ा (हाथ मिलाना) करते हैं और उसके लिए रहमत की दुआ करते हैं।

उन्होंने कहा कि सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों ने ग़दीर के स्थान और प्रतिष्ठा को महत्व दिया है, और इतिहास में बहुत कम ऐसे विषय मिलते हैं जिन पर पैग़म्बरों ने इतना ध्यान दिया हो। यह ग़दीर की महानता और इस्लामी संस्कृति में इसके उच्च स्थान का स्पष्ट प्रमाण है।

सैयद अहमद रज़ा शाहरुख़ी ने हज़रत अमीरुल-मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) की प्रशंसा में कहा कि वह ज्ञान, जिहाद (संघर्ष) और परहेज़गारी (तक़्वा) हर क्षेत्र में सबसे श्रेष्ठ थे। रसूल-ए-अकरम (स.अ.व.) का प्रसिद्ध कथन "मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली इसका द्वार है" इसी सत्य को व्यक्त करता है कि अली इब्न अबी तालिब (अ.स.) पैग़म्बरी ज्ञान के द्वार हैं। उन्होंने कहा कि अपने समय के ख़लीफ़ा भी वैज्ञानिक और न्यायिक मामलों में हज़रत अली (अ.स.) की ओर रुजू करते थे।

उन्होंने आगे कहा कि जिहाद के मैदान में भी अमीरुल-मोमिनीन (अ.स.) की बहादुरी अद्वितीय थी और बद्र, उहुद, अहज़ाब और ख़ैबर जैसे युद्धों में उनकी कुर्बानियाँ इस्लाम के इतिहास का एक उज्ज्वल अध्याय हैं। इसी प्रकार तक़्वा और न्याय के क्षेत्र में भी वह पूर्ण उदाहरण थे।

ख़ुर्रमाबाद के इमाम जुमा ने हज़रत अली (अ.स.) के इस कथन की ओर इशारा किया कि यदि उन्हें काँटों पर घसीटा जाए, तब भी वह किसी चींटी के मुँह से अन्यायपूर्वक जौ का छिलका लेना पसंद नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि यह न्याय और तक़्वा की परम ऊँचाई है और इस्लामी व्यवस्था के सभी ज़िम्मेदारों के लिए एक बड़ा सबक है कि वे जनता के अधिकारों की रक्षा करें।

उन्होंने कहा कि गैर-मुस्लिम विद्वान भी इमाम अली (अ.स.) के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। ईसाई विचारक जैसे जुर्ज जुर्दाक़ और शिबली शुमैल ने अमीरुल-मोमिनीन (अ.स.) को सभी मानवीय गुणों का समूह बताया है।

अपने भाषण के दौरान उन्होंने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुश्मन की चालों और छल के मुकाबले में ईरानी राष्ट्र को सचेत रहना होगा। उन्होंने कहा कि हर युद्ध बातचीत पर समाप्त हो सकता है, लेकिन मूल मुद्दा राष्ट्रीय सम्मान, जागरूकता और हितों की रक्षा है। जनता की अपेक्षा है कि वार्ता करने वाले, राष्ट्र और सशस्त्र बलों की प्रतिरोधी भावना के अनुसार कदम उठाएँ और राष्ट्र के अधिकारों पर कोई समझौता न करें।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईरानी जनता, विशेषकर युवा, जनजातियाँ और लोरिस्तान के क़बीले, हमेशा इस्लामी क्रांति और देश की रक्षा के लिए तैयार रहे हैं। अंत में उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सद्भाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि दुश्मन मतभेद पैदा करके देश को नुकसान पहुँचाना चाहता है, इसलिए सभी को सतर्क रहना होगा।

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